Saturday 9 January 2010

जंग असामाजिक अनुभव के खिलाफ

बहुत दिनों बाद आज कुछ लिखने बैठा हूँ. शायद बात ही कुछ ऐसी है. जब इस ब्लॉग पर लिखना शुरू किया था तब शायद इतना ही सोचा था की समाज में व्याप्त धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक मान्यताओं का संकलन ही करूंगा. कुछ बहस होगी, और शायद कुछ नया सा निकल कर आएगा. पर और सोचने पर लगता है, मान्यताएं तो ऐसी भी हो सकती हैं, जिनका धार्मिक और सामाजिक पहलू न हो. महज व्यावहारिकता और तथाकथित अनुभव के नाम पर उनको सामाजिकता का जामा पहनाया जा रहा हो. बहस तो ऐसी मान्यताओं पर भी आवश्यक है.

आपको लग रहा होगा की मैं बात को इतना घुमा क्यों रहा हूँ. तो भूमिका के बाद अब असलियत पर आता हूँ. अक्सर ऐसा देखा गया है की सड़क दुर्घटनाओं में या ऐसी किसी विपदा में जहाँ पाला पुलिस से पड़ना हो, लोग कट के निकलना ही पसंद करते हैं. 'पुलिस के पचड़े' में नहीं पड़ना चाहते. अमबुलंस बुलाना तो दूर, पुलिस को भी नहीं बुलाते. किसी ने पुलिस को बुलाया भी तो वो अपनी ज़िम्मेदारी को वहीँ तक मानता है. पुलिस के मौका-ए-वारदात पर पहुँचते पहुँचते शायद काफी देर हो चुकी होती है. और पुलिस वैन भी डाक्टरी सुविधाओं से लैस तो होती नहीं है. प्रायः ऐसी दुर्घटनाओं में पीड़ित के पास इतना समय नहीं होती. ऐसे अनेक पीड़ित सड़क पर ही दम तोड़ देते हैं, और हम में से अधिकतर यह सोच कर आगे बढ़ जाते हैं, की क्या करें पुलिस है ही ऐसी की कौन पचड़े में पड़े. बात यहाँ तक ही नहीं, जो आगे बढ़ते हैं, उन्हें भी कुछ सलाह देने से नहीं चूकते की पचड़े में क्यों पड़ते हो. हवाला अनुभव का देते हैं, जिसके पास जितना अनुभव वोह उतनी ही पुरजोर वकालत करता है भाग खड़े होने की. यह बात अलग है की अगर अनुभव के इन वकीलों से पूछें की कितनी बार उन्होंने पुलिस का सामना किया है तो जवाब सिफर ही हो.

यह बात सुनी सुनाई नहीं है. कल के एक वाकये ने बड़ी गहरी चोट की है. एक सड़क हादसे में एक नौज़वान मारा गया. सड़क पर खड़े अधिकतर इंतज़ार करते रहे, औरों के आगे बढ़ने का, या पुलिस के आने का. आशा की किरण इतनी ही थी की कुछ एक आगे बढे भी, पुलिस भी आई, घायल अस्पताल भी पहुंचा, पर बच नहीं सका. और पता है क्या? पुलिस ने किसी को परेशान नहीं किया, हाँ कुछ सवाल पूछे जिनका जवाब देने में अनुभव की सीख देने से कहीं कम उर्जा और समय लगा. और अगर एक बार कोर्ट में जाकर एक आध बार गवाही देनी भी पड़े तो भी क्या एक जान की कीमत इतनी भी नहीं लगाई जा सकती है. पुलिस ने तो अपनी ज़िम्मेदारी निभाई, पर हम में से कुछ तो पुलिस के गैर जिम्मेदारियों की आलाप में इतने मशगूल हो गए, की अपनी ही ज़िम्मेदारी भूल गए. दुर्भाग्य तो यह है की जो जितना अधिक पढ़ा-लिखा और संभ्रांत है, वोह उतना ही अधिक निर्लज्ज है. इससे तो वोह अनपढ़ ही अच्छा जिसे पुलिस के पचड़े का पता ही न हो.

समाज सह अस्तित्व के लिए ही, जिम्मेदारियों से मुह मोड़ना सामाजिक तो नहीं कहा जा सकता. पर यह तो तर्क की बात है- मान्यताएं अक्सर तर्क को कुतर्क ही मानती हैं. पर ऐसी मान्यताएं क्या जंग नहीं मांगती? और तथाकथित कुतर्क- जो एक भिन्न अनुभव पर आधारित हों - ही इस जंग के हथियार हो सकते हैं. आप क्या कहते हैं?

अगर आप अपने अनुभवों को हमारे साथ बाँट सकें तो हमें काफी मदद मिलेगी.

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